आत्म योगी भव : अहिंसा धर्म पढ़ें विशेष

ये लेख आत्म योगी भव पुस्तक से है जिसकी लेखिका : श्रीमती वसंता शास्त्री व श्रीमती जसविंदर कौर हैं 8447084018

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राधाजी न्यूज़। धर्म शब्द को अच्छी तरह समझना बहुत जरूरी है। धर्म का दूसरा नाम है न्याय परायणता। जो सही है वही धर्म है, जो सही नहीं है वह अधर्म है। जैसे गाने में ‘श्रुति’ और ‘लय’ इधर . उधर हुआ तो वह अधर्म है। हर एक विषय में जो सही है, जो सही नहीं है उसका ज्ञान होने पर ही हम सही जीवन जिएंगे। जैसे बातचीत करने में, लोगों के बीच उठने . बैठने में, खाना बनाने में, काम करने में, मरने के समय, विधायक . मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनने पर सही करना ही धर्म है। यदि आप धर्म से चूक गए तो आप अधर्म कर रहे हो। जिस प्रकार चित्र और वीडियोग्राफी करते समय फोकस सही रखना है तभी चित्र सही आएगा ऐसे ही मैं जब बोल रहा हूँ मुझे सही तरह से बोलना है, आप जो सुन रहे हो आपको सही तरह से सुनना है। सही पद्धति से हर काम करें, ध्यान भी सही पद्धति से करें। गौतम बुद्ध ने अष्टांग मार्ग में सही चाहत, सही कर्म, सही जीवन बुद्धि, सही व्यवहार शैली, सही श्रद्धा, सही एकाग्रता, सही ध्यान आठ धर्म बताए हैं। ध्यान में निशब्द रहना है अर्थात मुँह में कोई भी ध्वनि ना हो और मन में कोई विचार ना हो। ध्यान सभी धर्मों में अति उत्तम धर्म है। जैसे सभी पर्वतों में एवेरेस्ट उच्च शिखर पर है, ऐसे ही सब धर्मों में ध्यान धर्म अति उत्तम है। उसके बाद अहिंसा धर्म आता है। दो धर्म हैं . स्वधर्म और परधर्म। स्वयं के प्रति सही व्यवहार करना स्वधर्म है और दूसरों के प्रति सही व्यवहार करना परधर्म है। स्वधर्म एक ही है पर परधर्म अनेक हैं। ध्यान स्वधर्म है, ‘अहिंसा’ परधर्म में सर्व प्रथम है। अहिंसा परमो धर्मः। हिंसा शारीरक हो या मानसिक वह हिंसा ही है। लोग समझते हैं केवल शारीरक हिंसा ही हिंसा है। मुँह से गाली निकालना हिंसा नहीं है। गौतम बुद्ध को बहुत सारे लोगों ने गालियां दी, पर उनके ऊपर कोई असर नहीं हुआ। आपने दूसरों की बातों को इतना महत्व क्यों दिया। आप ने महत्व दिया इसीलिए आप को हिंसा लगी। यदि हाथ . पाँव तोड़ दिया, जान से मार दिया, यह शरीर के ऊपर अत्याचार है। मानसिक हिंसा तभी होती है जब हम मन के ऊपर ले लेते हैं। बलात्कार करना भी हिंसा है। कोई मुझे गाली दिया मैंने प्रतिक्रिया नहीं की तो यह मेरे लिए मानसिक हिंसा नही है। अगर कोई मेरा हाथ मोड़ा तो यह हिंसा होगी। शारीरक हिंसा अत्याचार है। माँ . बाप बच्चों को डांट सकते हैं मगर मार नहीं सकते। हर जगह पर जानवरों को मारना हिंसा ही है। मानव मांस खाकर भगवान के सामने प्रार्थना करता है कि ”भगवान मेरी रक्षा करो”, दूसरों को मारते हो और अपनी रक्षा चाहते हो। मंदिर के सामने मांस की दुकान खोलते हो, एक तरफ प्रार्थना करते हो दूसरी तरफ जीव हत्या करते हो। जैसा तुम दूसरों के साथ व्यवहार करते हो वैसा ही व्यव्हार तुम्हारे साथ भी होगा। धर्म करोगे तो धर्म होगा, अधर्म करोगे तो अधर्म होगा। जो भी करना है करो खुली छूट है पर जैसा करोगे वैसा ही मिलेगा,मारोगे तो मारे जाओगे, रक्षा करोगे तो रक्षा होगी, जो दूसरों के साथ करोगे वह ही वापस आएगा। यही सृष्टि को चलाने वाला कर्म सिद्धांत है। इस सिद्धांत को जानने वाला ही ज्ञानी है। इस जन्म में जो कर्म सिद्धांत को जाना वह ज्ञानी है और जो जन्म परंपरा में कर्म सिद्धांत को जाना वह सुज्ञानी ब्रह्मज्ञानी है। ज्ञानी को एक ही जन्म का ज्ञान है, लेकिन ब्रह्ममज्ञानी को पिछले जन्मों का भी ज्ञान है। बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः बहू।। श्री कृष्ण ने कहा “अर्जुन मैं और तुम अनेकानेक जन्म ले चुकें हैं, तुम सिर्फ ज्ञानी हो मैं ब्रह्मज्ञानी हूँ।“ पांडव ज्ञानी यानि उत्तम पुरुष हैं कृष्ण ब्रह्मज्ञानी यानि पुरषोत्तम हैं और कौरव अज्ञानी हैं। कौरवों को कर्म सिद्धांत पता नहीं है कि जो किया उसका फल भोगना पड़ेगा इसलिए द्रोपदी का मान भंग किया। ऐसा लगता है हम सब कुछ जानते हैं पर हमें कुछ भी पता नहीं है। कोई व्यक्ति यदि मुझ से आकर पूछता है कि दूसरा जन्म है क्या तो उसका अर्थ है वह अज्ञानी है। जो आँखों से नहीं दिखाई देता वह नहीं है ऐसा सोचना ही अज्ञान है। जब सूर्योदय होता है तो नक्षत्र नहीं दिखाई देते इसका अर्थ यह नहीं कि नक्षत्र नहीं हैं। जो आँखों से दिखाई देता है वह बहुत कम है और जो नहीं दिखाई देता वह बहुत ज्यादा है। अनंत ब्रह्मांड हैं। इस जन्म में ध्यान कर के अनेक जन्मों को जानना ही आत्मज्ञान है। भगवत गीता पढ़ने से पिछले जन्मों का पता नहीं चलता। ब्रह्मर्षि पत्री जी के पावँ पकड़ने से भी पिछले जन्मों का पता नहीं चलेगा। उसके लिए आप को ध्यान कर के स्वयं ब्रह्मर्षि बनना है। अज्ञान से ज्ञान, ज्ञान से ब्रह्मज्ञान की तरफ आना है। कौरवों ने पांडवों को जितनी भी तकलीफ दी उन्होंने प्रतिक्रिया नहीं की। द्रौपदी का मानभंग करने पर भी, अरण्यवास के समय भी प्रतिक्रिया नहीं की। केवल आपद स्थिति में स्वयं को बचाने के लिए आपद धर्म का पालन किया। हर नियम के साथ अपवाद होते हैं। धर्म और आपद धर्म का पता होने पर ही हम धर्मानुसार जीवन जी सकते हैं। हर परिस्थिति में बेहतर से बेहतर करने के लिए हमें अपवाद भी पता होने चाहिए। बिना ज्ञान के अगर अपवाद को इस्तेमाल किया तो सही नहीं है, लेकिन उसी अपवाद को ज्ञान के साथ ब्रह्मज्ञानी ने इस्तेमाल किया तो वह सही है।

नोट : आप भी ध्यान द्वारा ज्ञान के प्रकाश में आयें ध्यान करें शाकाहारी बनें, हमारा चंडीगढ़ का पता जहाँ आप भी पिरामिड ध्यान कर सकते हैं : सूद भवन , सेक्टर 44 A, चंडीगढ़, मैडिटेशन क्लास सूद भवन में, हर शनिवार शाम 5 बजे से 7 बजे तक और हर रविवार शाम 6 बजे से शाम 8 बजे तक सम्पर्क करें : 9888609069

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