जानिये शाकाहार धर्म और मासाहार अधर्म क्यों हैं।

ये लेख आत्म योगी भव पुस्तक से है जिसकी लेखिका : श्रीमती वसंता शास्त्री व श्रीमती जसविंदर कौर हैं 8447084018

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राधाजी न्यूज़। शरीर का ध्यान रखें। हमें अपने शरीर के प्रति सही व्यवहार करना चाहिए। शरीर को कष्ट देना अधर्म है। ज्यादा खाना, ज्यादा सोना, ज्यादा आराम करने का अर्थ है शरीर को कष्ट देना। पेट्रोल गाड़ी में डीज़ल और डीज़ल गाड़ी में मिट्टी का तेल डाला तो वह खराब हो जाएगी। ठीक उसी प्रकार हमारा शरीर शाकाहार भोजन के लिए बना है, उसमें मांसाहार डालने से वह रोगी हो जायेगा और उसकी आयु कम हो जाएगी। मांसाहार लेना शरीर के प्रति अधर्म करना है। जो शाश्वत सत्य को पहचान कर अशाश्वत लोगों के बीच में प्रपंचिकजीवन जी रहा है वह बुद्धा है। आध्यात्मिक सत्य को जानकार उस ज्ञान से जीवन जी रहा है वह बुद्धा है। वह सुनहरी मध्यमार्ग में यानि 50ः प्रपंचिकता और 50ः आध्यात्मिकता में समान रूप से जी रहा है। यदि आप मास्टर हैं तो आप अपने शरीर की उचित देखभाल करेंगे। ना कम खाएंगे ना ज्यादा खाएंगे। आप इस शरीर के साथ कहीं भी जा सकते हैं और जितना समय चाहे आप इस शरीर में रह सकते हैं। यह आप के ऊपर निर्भर है। हफ्ते में तीन दिन केवल फल खाएं, एक दिन ठोस आहार और एक दिन तरल आहार लें। धर्म अर्थात नीति परायणता जैसे दूसरे प्राणी की देखभाल करते हैं वैसे ही खुद की भी देखभाल करनी है। जब भूख लगे तब खाना खाओ, जब भूख ना हो तब उपवास करो। हमेशा ताजा व् स्वादिष्ट खाना खाएं। फ्रिज में दूध, दही और फल सब्जियां रखें। खाना बनाकर फ्रिज में रख कर कई दिन तक खाना मूर्खता है। आहार सही तरह लेना ही शरीर के प्रति सही व्यवहार करना है। माइक्रोवेव में खाना ना बनाएं और ना गर्म करें। माइक्रोवेव की ऊर्जा शरीर के लिए घातक है। खाने में लहसुन का प्रयोग ना करें। लहसुन को नकारात्मक ताकतों ने बनाया है उसका प्रयोग करने से शाकाहारी भी मांसाहारी बन जाता है। लहसुन एक जासूस की तरह है, जैसे एक देश का जासूस दूसरे देश में रहकर वहां से समाचार भेजता रहता है। इसी तरह लहसुन नकारात्मक ताकतों के लिए काम करता है। मशरुम भी नहीं खाना चाहिए। मशरुम ना फल है ना सब्जी, वह फंगस है। उसमें जीवन शक्ति बिलकुल नहीं है। आहार मुख्यता आत्मरंजन के लिए है। जो भोजन आत्मा को ज्यादा आनंद देता है वह भोजन ही शरीर को पूर्ण आरोग्य देता है, यह आध्यात्मिक विज्ञान का अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है। भोजन से आत्मा और शरीर दोनों साथ-साथ पोषित होते हैं। शरीर आत्मा की छाया है। यदि आत्मा संतुष्ट, आनंदित और परिपूर्ण है तो शरीर भी स्वस्थ और आरोग्य होता है। जैसे जब हम मग्न होकर संगीत सुनते हैं और हमारी आत्मा आनंदित हो जाती है तो हमें भूख भी नहीं लगती। आत्मा संतुष्ट होने से शरीर भी संतुष्ट हो जाता है। मुँह से जो शब्द निकलते हैं वह जितने महत्वपूर्ण हैं उतना ही महत्वपूर्ण है जो हम खाना मुँह के माध्यम से ग्रहण करते हैं। बेस्वाद खाना, सही तरह से न पकाया गया खाना, अरुचि से बनाया गया खाना आत्मा की दरिद्रता का सूचक है। आत्मा की दरिद्रता को दूर करना ही आध्यात्मिकता है। यह ऐसा ही है जैसे बिना श्रुति के संगीत, बिना लय के गति और बिना सुंदरता के घर है। एक आत्मज्ञानी द्वारा पकाया गया खाना ऊर्जावान होता है। जो पाक शास्त्र में निपुण है, आत्मज्ञानी है और ध्यानी है उसी को खाना बनाना चाहिए। अगर आप को ऐसा खाना बनाना नहीं आता तो किसी अनुभवी पाक शास्त्री, आत्मज्ञानी से सीखना है। जैसे हम अच्छे तबला वादक से तबला बजाना सीखते हैं, वैसे ही जिसको अच्छा खाना बनाना आता है उसे खाना बनाना सीखना है। आध्यात्मिक जीवन में वैराग्य नहीं वैभोग है। मैं अपने इस शरीर का बहुत अच्छे से ध्यान रखता हूँ, क्योंकि मुझे और 80 साल इस शरीर में रहना है। मैं 2095 में इस शरीर को छोडूंगा। मेरा उद्देश्य है जब तक धरती पर आखिरी मानव बुद्ध नहीं बनेगा मैं यह शरीर नहीं छोडूंगा। यह मानव शरीर एक बहुत बड़ा कारखाना है। इसमें हर एक अणु एक कर्मचारी है। लाखों कर्मचारी इस कारखाने में मिलकर काम कर रहे हैं। हमें सभी कर्मचारियों की अच्छी तरह देखभाल करनी है। अपने शरीर के प्रत्येक अणु से बात करें। शराब का सेवन न करें ऐसा करने से सभी कर्मचारी मदहोश होकर सो जायेंगे और कुछ भी काम नहीं करेंगे। एक बुद्धा को हर दिन तीन घंटे ध्यान करना है। जो भी खाना खाना है उसको बहुत ही स्वादिष्ट और गुणवत्ता से परिपूर्ण बनाना है। ऐसा खाना आपके शरीर को ऊर्जा और रोग मुक्त लंबा जीवन देगा। जब भी खाएं आनंद के साथ खाएं। बिना रुचि के ना खाएं। जिस तरह ध्यान शास्त्र है उसी तरह पाक शास्त्र भी है। हमें लगता है हमें सब समझ है पर देखा जाए तो हमें कुछ भी पता नहीं है। पाक शास्त्र एक महान विज्ञान है जिसके बारे में हम बहुत कम जानते हैं। हम इस विज्ञान को नजरअंदाज करके केवल जीभ के स्वाद के लिए उचित, अनुचित सब कुछ खा रहे हैं। इसी वजह से आज इतनी बीमारियाँ फैली हुई हैं। अपने शरीर के प्रति आहार धर्म का पालन करें। शरीर का संबंध डॉक्टर से नहीं खुद से है। शरीर के प्रति आरोग्य धर्म निभाएं। अतः ध्यानी बनें ! शाकाहारी बनें।

नोट : आप भी ध्यान द्वारा ज्ञान के प्रकाश में आयें ध्यान करें शाकाहारी बनें, हमारा चंडीगढ़ का पता जहाँ आप भी पिरामिड ध्यान कर सकते हैं : सूद भवन , सेक्टर 44 A, चंडीगढ़, मैडिटेशन क्लास सूद भवन में, हर शनिवार शाम 5 बजे से 7 बजे तक और हर रविवार शाम 6 बजे से शाम 8 बजे तक सम्पर्क करें : 9888609069

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